सप्ताहांत: तेरा दुख और मेरा दुख

sorrow

अभी कुछ दिनों पूर्व एक पत्रकार साथी का कोरोना बीमारी के कारण दुःखद निधन हो गया था। मैंने उनको श्रद्धांजलि देते हुए फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी कि “आज मैं बहुत दुखी हूं।” मेरी पोस्ट को पढ़कर मेंरे एक साथी फोन आया कि कोरोना से सैकड़ों लोग रोज मर रहे हैं, आपने कभी दुख व्यक्त नहीं किया पर आज आप ज्यादा दुखी क्यों हैं?

यह एक ऐसा सवाल था जिसका जवाब देना ना तो बहुत आसान था पर कठिन भी नहीं था। मुझे एक घटना याद आ गई। जिस समय अमृतसर में 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार हुआ, सरदार खुशवंत सिंह ने अपनी पद्म भूषण की उपाधि को वापस कर दिया। उनसे भी काफी लोगों ने पूछा कि पंजाब में आतंकवादी रोज सैकड़ों लोगों की हत्या कर रहे हैं, तब आपने अपनी उपाधि वापस नहीं की। लेकिन आज जब ऑपरेशन ब्लूस्टार हुआ है तो आपने अपनी उपाधि क्यों वापस की। उनका कहना था, आज मैं बहुत दुखी हूं। यदि पड़ोस में
किसी का निधन होता है तब भी हम दुखी होते हैं। लेकिन यदि परिवार में किसी की मृत्यु होती है तो बहुत ज्यादा दुखी होते हैं ।

मेरा भी यही मानना है। हम पूरे दिन टीवी चैनल पर अखबारों में दुखद खबरें पढ़ते हैं। कई कई बार तो उनको पढ़ कर बहुत दुख होता है, रोना भी आता है। लेकिन कुछ खबरें सामान्य होते हुए भी ऐसी होती हैं कि उनसे भी ज्यादा दुख होता है दर्द होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी दुर्घटना में बहुत सारे लोगों की मृत्यु हो गई, यह सुनकर दुख हुआ लेकिन उससे भी ज्यादा दुख तब हुआ जबकि नंगे पांव गरम सड़क पर पैदल चलते हुए मजदूर के बच्चे के पैर में छाले देखे। कुछ लोग एक घटना से खुश हो सकते हैं तो दूसरे लोग उसी घटना से दुखी भी हो सकते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पहले से दिया चला जा रहा है। वह वर्षा का है। जब भी बरसात होती है तो किसान खुश होते हैं लेकिन मिट्टी के बर्तन बनाने वाला कुमहार दुखी होता है।

दुःख ऐसा विषय है जिस पर वैदिक काल से बहुत लिखा गया है। ग्रन्थ के ग्रन्थ भरे पड़े हैं। “ओशो ने दुख के बारे में कहा है दुख ही दुख अगर पाया है तो बड़ी मेहनत की होगी पाने के लिए, बड़ा श्रम किया होगा, बड़ी साधना की होगी, तपश्र्चर्या की होगी! अगर दुख ही दुख पाया है तो बड़ी कुशलता अर्जित की होगी! दुख कुछ ऐसे नहीं मिलता, मुफ्त नहीं मिलता। दुख के लिए कीमत चुकानी पड़ती है।”

“आनंद तो यूं ही मिलता है; मुफ्त मिलता है; क्योंकि आनंद स्वभाव है। दुख अर्जित करना पड़ता है। और दुख अर्जित करने का पहला नियम क्या है? सुख मांगो और दुख मिलेगा। सफलता मांगो, विफलता मिलेगी। सम्मान मांगो, अपमान मिलेगा। तुम जो मांगोगे उससे विपरीत मिलेगा। तुम जो चाहोगे उससे विपरीत घटित होगा। क्योंकि यह संसार तुम्हारी चाह के अनुसार नहीं चलता। यह चलता है उस परमात्मा की मर्जी से।”

– सर्वज्ञ शेखर

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