एग्जिट पोल का एक्ज़ेक्ट पोल

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19 मई को मतदान 6 बजे समाप्त हुआ, लेकिन 4 बजे से ही समाचार चैनलों में एग्जिट पोल घोषित करने की ऐसी होड़ लगी रही जैसे कि असली परिणाम ही आ गए हैं। चुनाव आयोग की हरी झंडी मिलते ही सनसनाते हुए परिणाम गूंजने लगे, पता नही आखिरी दौर की 59 सीटों को कैसे कवर किया होगा, कवर भी किया होगा या नही। एक चर्चा और सोशल मीडिया पर चलने लगी, क्या आप से कभी किसी चेनल वाले ने संपर्क किया। जवाब शत प्रतिशत लोगों का "न" ही था। तो फिर किस से डाटा कलेक्ट करते हैं।

खैर कुछ तो करते ही हैं, हम न तो एग्जिट पोल एजेंसियों और न ही समाचार चैनलों की ईमानदारी पर कोई प्रश्नवाचक चिह्न लगा रहे। वरना ये लोग इतने आत्म विश्वास से अपनी बात नही कह पाते।

पर इतना अवश्य है कि सारे एग्जिट पोल में काफी अंतर तो है पर कुल मिला कर इशारा यही है कि कोई अप्रत्याशित चमत्कार नही हुआ तो सरकार एन डी ए की ही बन रही है। सीटों की संख्या कम ज्यादा हो सकती है। इसीलिए हमें तो एग्जिट पोल पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता ओमर अब्दुल्ला की टिप्पणी बड़ी सही लगी कि सारे पोल ग़लत नही सकते।

हम भी सहमत हैं, परंतु हम भी हां में हां मिला दें तो यह लेखनी यहीं रुक जाएगी। विचार प्रवाह तभी आगे बढ़ता है जब मंथन हो।

चैनलों का नाम चैननो रख दिया जाए तो भी चलेगा क्योंकि इन्हें चैन नही पड़ता। 19 मई से पूर्व एग्जिट पोल के बारे में कोई जिक्र न करने के चुनाव आयोग के निर्देशों के बावजूद ये लोग घुमा फिरा कर मतदान को प्रभावित करने वाली जानकारियां देते रहे। लाइन में खड़े वोटरों के मुंह पर जबरदस्ती माइक लगा कर अपने बचाव में पहले तो कहते थे यह मत बताइए कि आप किसे वोट दे रहे हैं पर यह बताइए कि क्या वोट देते समय आपके दिमाग में राष्ट्रवाद भी एक मुद्दा है या न्याय योजना। इस प्रकार इशारों में अपनी बात कहलवा ली जाती है।मतदान के दौरान ही एक चैनल ने कुछ ज्योतिषियों को आमंत्रित कर लिया। उन्होंने सारी दशाओं आदि की गणना करके घोषणा कर दी कि मोदी जी इस बार और अगली बार भी प्रचण्ड बहुमत से सत्ता में आ रहे हैं। एक समाचार पत्र में ज्योतिषी महोदय ने कहा यदि सारे परिणाम 23 मई को आगये तो मोदी जी की जीत होगी और 24 तारीख तक खिसक गये तो राहुल गांधी के पक्ष में आएंगे। अब बताइए क्या तुक है, दिन बदलने से ई वी एम में पड़े वोट भी बदल सकते है क्या।

आज तक एग्जिट पोल के आंकड़े कुछ हद तक 2014 में ही सही रहे हैं अन्यथा 2004, 2009 लोकसभा चुनाव, दिल्ली विधानसभा चुनाव, आदि में इनका क्या हश्र हुआ सभी जानते हैं। इस संबंध में विस्तार से सारी जानकारी प्रिंट मीडिया ने दे दी है, अतः उसकी पुनरावृत्ति की आवश्यकता नही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल के अभी के आंकड़ों में भी बहुत विरोधाभास है और ऐसा लगता है कि ये किसी के भी सही होने वाले नही हैं। प्रिंट मीडिया वाले एग्जिट पोल नही करते परन्तु इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आंकड़ों को आधार बना कर अपनी राय बना लेते हैं।

मजे की बात यह भी है कि जिनके पक्ष में ये आंकड़े हैं वह भी इन पर पूरी तरह भरोसा न करके अपनी ओर से पूरी सतर्कता बरतते हुए भविष्य की रणनीति बना रहे हैं। यही इन आंकड़ों की नियति है। कुछ चैनल वाले 23 मई को अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे तो कुछ जरूर बगलें झांकेंगे।

खास बात: सर्वज्ञ शेखर की कलम से - स्वराज्य टाइम्स 21 मई 2019

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