सप्ताहांत: मेरे गुरु जी

जिस समय मैं यह पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, आज शिक्षक दिवस है। तथापि इस आलेख के प्रकाशित होने तक शिक्षक दिवस निकल चुका होगा।

मैं इस पुनीत अवसर पर अपने प्राइमरी शिक्षक जिन्होंने सबसे पहले मेरे को एक प्राइमरी विद्यालय में शिक्षा दी, वह छोटे से विद्यालय के प्रधानाचार्य थे, आदरणीय चंदन लाल गुप्ता जी को याद करना चाहता हूँ। उन्होंने ही मेरे जीवन की शैक्षिक आधारशिला रखी जो कि बाद में निरंतर मजबूत होती गई ।वह हमेशा कहते थे कि जो कुछ सोचो उसको प्राप्त करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हो जाओ तो वह इच्छा अवश्य पूरी होती है। वह हमेशा अपने बारे में बताया करते थे कि जब मैं पैदल चलता था तो पीछे से साइकिल वाले घंटी बजाते थे तो मैंने सोचा अच्छा ठीक है मैं भी साइकिल लूंगा, और मेरे पास साइकिल आ गई। जब मैं साइकिल पर चलता था तो पीछे से स्कूटर वाले हॉर्न बजाते थे तो मैंने सोचा अच्छा मैं स्कूटर लूंगा तो मेरे पास स्कूटर आ गया। जब मैं स्कूटर पर चलता था पीछे से कार वाले हॉर्न बजाते थे तो मैंने सोचा मैं कार लूंगा और मेरे पास कार आ गई। उनके कहने का तात्पर्य यह था कि यदि आप कुछ पाने का या कुछ करने का सोच लेते हैं और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हो जाते हैं तो वह लक्ष्य अवश्य प्राप्त होता है। उनकी शिक्षा से मैं बहुत प्रभावित हुआ और मैंने भी अपने जीवन में जो सोचा, जो लक्ष्य निर्धारित किए, ईश्वर की कृपा से उनको पाया।

मेरी शुरू से एक इच्छा थी कि मैं शिक्षक बनूँ, वह इच्छा मेरी नहीं पूरी हो पाई और मेरी सर्विस बैंक में लग गई। बैंक में रहते हुए भी मैंने देखा कि बैंक में बड़े-बड़े प्रशिक्षण कार्यालय हैं जहां पर शिक्षण कार्य होता है। तब मैंने लक्ष्य निर्धारित कर लिया कि मैं अपने बैंक में प्रशिक्षण कार्य अवश्य करूंगा। बैंक के प्रशिक्षण कार्यालय मैं जाना इतना आसान नहीं था। बड़ी लंबी चयन प्रक्रिया थी। पहले स्क्रीनिंग, उसके बाद ऑनलाइन साक्षात्कार, फिर ग्रुप डिस्कशन, फिर डेमोंसट्रेशन, फिर वन टू वन इंटरव्यू। तब जाकर कहीं चयन होता था लेकिन मैंने इस पूरी प्रक्रिया को पार किया और मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ गुड़गांव में बैंक के बहुत बड़े प्रशिक्षण कार्यालय के प्राचार्य बनने का। प्राचार्य बनने, इंचार्ज बनने के लिए बहुत लोग लाइन में रहते थे और बहुत लोगों की इच्छा होती थी। ईश्वर ने मेरी इच्छा पूरी की और मैं वहां पर प्राचार्य तो था ही लेकिन फिर भी कक्षा में प्रशिक्षण देना मुझे अच्छा लगता था। प्रशिक्षण देने के दौरान मैंने अपने आप को टीचर कम, शिक्षक कम और विद्यार्थी के रूप में ज्यादा रखा। मैं, जो मेरे साथ के अन्य फैकल्टी मेंबर थे उनसे सीखता था, जो बैंक के लोग प्रशिक्षण लेने आते थे उनसे कोई न कोई नई बात जरूर सीखता था और उनको अपनाता था। मुझे सौभाग्य है कि मेरे नेतृत्व में बैंक के लिए लगभग 8000 नए लिपिक, अधिकारी, प्रबंधक आदि तैयार हुए जो कि आज बैंक में कार्यरत हैं।यह एक अनवरत प्रक्रिया है जो मेरे से पहले भी की जा रही थी और अभी भी जारी है। लेकिन मेरे लिए एक अच्छा अनुभव रहा, शिक्षक के रूप में भी प्रशिक्षक के रूप में भी। मैं आज उन गुरुओं के चरणों में नमन करता हूँ जिन्होंने मेरे शैक्षिक जीवन में, व्यवहारिक जीवन में, बैंकिंग जीवन में किसी न किसी रूप में मुझको सिखाया। मेरा स्वभाव भी है सीखने का। मैं तो हमेशा सीखता ही रहूंगा।

– सर्वज्ञ शेखर

(Pic Credit: Sudarsan Pattnaik)

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