सप्ताहांत – बैंकों का विलय और राष्ट्रपति भवन की शान

#स्वराज्य_टाइम्स, 01 सितम्बर, 2019

इस सप्ताह जिन दो खबरों ने मुझे ज्यादा प्रभावित किया वह हैं अर्जुन पुरस्कारों का वितरण व बैंकों के विलयन की घोषणा। या यों कहिए कि ये दोनों विषय कुछ कुछ मुझ से जुड़े हुए हैं इसलिए मैं अधिक अधिकार से लिख सकता हूँ।

जुड़े हुए से तात्पर्य है कि अर्जुन पुरस्कार राष्ट्रपति भवन में वितरित किए गए,मुझे राष्ट्रपति भवन की गरिमा, शालीनता, अनुशासन बहुत प्रिय है, दूसरे आगरे की बेटी पूनम यादव को यह अवार्ड मिला। आगरा को जब किसी के साथ जोड़ कर आगरे लिखा जाता है तो अपनत्व का असीम अहसास होता है। दूसरा विषय है बैंकों के विलयन का, तो इससे तो मैं अपने को सीधा सीधा जुड़ा हुआ मानता हूँ, गलत न समझिये, निर्णय से नहीं, केवल विषय से ही। पूर्व बैंकर और साथ ही साथ लेखन में रुचि होने के कारण अन्य वित्तीय व बैंकिग विषयों के साथ साथ इस विषय पर भी मैंने काफी शोध किया था और बैंकों की शीर्षस्थ संस्था आई बी ए की पत्रिकाओं व भारतीय रिजर्व बैंक की पत्रिका बैंकिंग चिंतन अनुचिंतन में 1998-99 में ही प्रकाशित हुए थे। बैंकों के विलयन की प्रक्रिया कोई नहीं है, 1991 से प्रारम्भ हुए वित्तीय सुधारों व बैंकिंग सुधारों का ही यह एक अंग है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में 1991 के आर्थिक संकट के उपरान्त बैंकिंग क्षेत्र में सुधार की दृष्टि से जून 1991 में एम. नरसिंहम की अध्यक्षता में नरसिंहम् समिति( वित्तीय क्षेत्रीय सुधार समिति) की स्थापना की गई। समिति ने अपनी संस्तुतियां दिसंबर 1991 में प्रस्तुत की। नरसिंहम समिति द्वितीय का गठन 1998 में हुआ।

1991 में नरसिंहम् समिति की सिफारिशों ने भारत में बैंकिंग क्षमता को बढ़ने में मदद की। इसने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिये व्यापक स्वायत्तता प्रस्तावित की थी। समिति ने बड़े भारतीय बैंकों के विलय के लिये भी सिफारिश की थी। इसी समिति ने नए निजी बैंकों को खोलने का सुझाव दिया जिसके आधार पर 1993 में सरकार ने इसकी अनुमति प्रदान की। नरसिंहम समिति ने बैंकों के पुनर्निर्माण के ऊपर भी जोर दिया। इस समिति के अनुसार 3 या 4 अन्तर्राष्ट्रीय बैंक, 8 या 10 राष्ट्रीय बैंक तथा कुछ स्थानीय बैंक एवं कुछ ग्रामीण बैंक एक देश के अन्दर होने चाहिए।

1998 में गठित नरसिंहम समिति की प्रमुख सिफारिषयों के अनुसार सुदृढ़ वाणिज्यिक बैंकों का आपस में विलय अधिकतम आर्थिक और वाणिज्यिक माहौल पैदा करेगा और इससे उद्योगों का विकास होगा।

अपनी सिफारिशों को विस्तार देते हुए समिति ने कहा कि सुदृढ़ वाणिज्यिक बैकों का विलय कमजोर वाणिज्यिक बैकों के साथ नहीं किया जाना चाहिए और देश के बड़े बैंकों को अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए।

अभिप्राय यह है कि यह एक पुरानी अवधारणा है जिसपर गठबन्धन की मिलीजुली सरकारें अपना गठबन्धन धर्म निभाने के कारण अंतिम निर्णय नहीं ले पाईं। बहुमत की सरकार आने के साथ ही भाजपा ने अपने पिछले कार्यकाल से ये प्रयोग शुरू किया,और अब यदि राजनीतिक रूप से कहें तो आर्थिक मंदी और अन्य ज्वलन्त विषयों से ध्यान हटाने के लिऐ आनन फानन में, बिना किसी से सलाह किए यह विशाल निर्णय कर डाला। वैसे यह विशुद्ध आर्थिक फैसला है और निश्चित रूप से बैंकों की स्थिति को मजबूत करेगा, उनपर सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक का नियंत्रण और नज़र अब तीक्ष्ण रहेगी जो अंततोगत्वा अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव भी डालेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था के जो वर्तमान हालात हैं, उन्हें ध्यान में रखते हुए सरकार को कुछ तो करना ही होगा या कुछ न कुछ करते हुए दिखना होगा।

और अब अर्जुन पुरस्कार। चूंकि आगरा की बिटिया पूनम यादव को यह पुरस्कार मिलना था अतः बड़ी खुशी के साथ राष्ट्रपति भवन का यह कार्यक्रम लाइव देखा। इससे पूर्व दो बार राष्ट्रपति महोदय के कार्यक्रम में भाग लेने का गौरवपूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। एक बार माननीय वेंकट रमन जी के समय, जब मेरे पूज्य पिता रोशनलाल गुप्त करुणेश जी ने उनसे भेंट की थी। स्वराज्य टाइम्स के संस्थापक संपादक आदरणीय आनन्द शर्मा जी व संपादक विजय शर्मा जी व अन्य परिजनों के साथ में मैं भी इस अवसर पर था। दूसरा अवसर विज्ञानभवन दिल्ली में राष्ट्रपति माननीय प्रणव मुखर्जी द्वारा राजभाषा पुरस्कारों के वितरण का अवसर था। जिसमें हमारे केनरा बैंक को भी अवार्ड प्राप्त हुआ। हमारी ई डी महोदय ने यह पुरस्कार प्राप्त किया व अन्यों के साथ में मैं भी अतिथि के रूप में आमंत्रित था।

यह सब उद्धरित करने का अभिप्राय इतना ही है कि राष्ट्रपति महोदय के कार्यक्रमों की भव्यता,गरिमा, शालीनता, अनुशासन बहुत प्रभावित करता है। बोलने वाला एक एक शब्द पूर्व निर्धारित होता है, घड़ी की सुई और संचालक के मुंह से निकलने वाले शब्द एक साथ चलते हैं, क्या मजाल कि जिस समय जो निर्धारित किया गया है वह जरा भी इधर उधर हो जाये,नए लोगों को हर चीज का एक दिन पूर्व रिहर्सल कराया जाता है, कैसे चलना है, कहाँ तक जाना है, कहाँ रुकना है, हर गतिविधि नियंत्रित होती है, यहाँ तक कि राष्ट्रपति महोदय से भावावेश में आ कर हाथ मिलने या चरण स्पर्श न करने की भी विनम्र सलाह प्रदान की जाती है। वहाँ की साज सज़्ज़ा, देशभक्ति का अहसास और जीवन में कभी कभार प्राप्त होने वाले ऐसे गौरवशाली क्षणों की सुखद अनुभूति, वक्ष को विस्तारित कर ही देती है।

– सर्वज्ञ शेखर

[bg_collapse view=”button-red” color=”#ffffff” icon=”eye” expand_text=”Read in English” collapse_text=”Show Less” ]

End of Week – Merger of Banks and Pride of Rashtrapati Bhavan

Swarajya Times, 01 September, 2019

The two reports that impressed me the most this week are the distribution of Arjuna Awards and the announcement of merger of banks. Or rather say that both these subjects are related to me, so I can write with more authority.

Connected means that the Arjuna Awards were distributed in Rashtrapati Bhavan, I love the dignity, decency, discipline of Rashtrapati Bhavan, Poonam Yadav, the daughter of another Agra, received this award. When Agra is written with someone, it feels infinite. The second topic is about the merger of banks, so by this I consider myself directly connected, do not misunderstand, not by decision, but only by the subject. Due to my interest in writing as a former banker, as well as other financial and banking subjects, I also did a lot of research on this topic and in the journal Thinking Anchithan, a magazine of IBA, the apex institution of banks and the magazine of Reserve Bank of India, 1998 Were published only in -99. There is no merger process of banks, it is a part of financial reforms and banking reforms started since 1991.

After the 1991 economic crisis in the Indian economy, Narasimham Committee (Financial Regional Reforms Committee) was established in June 1991 under the chairmanship of M. Narasimham with a view to improving the banking sector. The committee submitted its recommendations in December 1991. Narasimham Committee II was formed in 1998.

The Narasimham Committee recommendations in 1991 helped to increase banking capacity in India. It had proposed wide autonomy for public sector banks. The committee had also recommended for merger of big Indian banks. The same committee suggested opening of new private banks, on the basis of which the government gave its permission in 1993. Narasimham committee also stressed on the reconstruction of banks. According to this committee, 3 or 4 international banks, 8 or 10 national banks and some local banks and some rural banks should be within one country.

According to the main recommendations of the Narasimham committee set up in 1998, the merger of strong commercial banks will create maximum economic and commercial environment and will lead to the development of industries.

Extending its recommendations, the committee said that strong commercial banks should not be merged with weak commercial banks and large banks of the country should be given an international character.

The idea is that it is an old concept on which the coalition governments did not take the final decision because of their coalition religion. With the coming of the majority government, the BJP started these experiments from its previous term, and now politically speaking, it is easy to divert attention from the economic downturn and other burning issues, without making any huge decision. Inserted. While this is a purely economic decision and will certainly strengthen the position of the banks, the government or the Reserve Bank of India will have a keen eye on them and will have a positive impact on the economy eventually. Keeping in mind the present conditions of the Indian economy, the government must do something or be seen doing something.

And now Arjuna Award. As the daughter of Poonam Yadav of Agra was to receive this award, she watched this event of Rashtrapati Bhavan live with great pleasure. Earlier, it was a proud opportunity to participate in the President’s program twice. Once during the time of Honorable Venkat Raman ji, when my revered father Roshanlal Gupta Karunesh ji met him. I was also on this occasion along with the founder editor of Swarajya Times, Venerable Anand Sharma ji and Editor Vijay Sharma ji and other family members. The second occasion was the distribution of the Official Language Awards by President Honorable Pranab Mukherjee at Vigyan Bhawan Delhi. In which our Canara Bank also received the award. Our ED Sir received this award and along with others I was also invited as a guest.

The intention of quoting all this is so much that the grandeur, dignity, decency and discipline of the President’s programs are greatly affected. Every single word that is spoken is predetermined, the clock and the words coming out of the operator’s mouth go together, should the time that what has been determined go a bit here and there, let the new people know about everything Rehearsals are held a day before, how to walk, where to go, where to stay, every activity is controlled, even with the President in touch with hands and not touching the feet He is also humble advice. The decor there, the feeling of patriotism and the pleasant feeling of such glorious moments in life, sometimes only enhances the chest.

– Sarwagya Shekhar

[/bg_collapse]

Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x