चुनावी ड्यूटी : डर कर भागिए नही

जब भी चुनाव आते हैं, चुनावी कामकाज , मतदान, मतगणना आदि के लिए ड्यूटियां लगाई जाती हैं ,फिर चाहे विधान सभा, लोकसभा या निकायों के ही क्यों न हों। निकायों और विधानसभाओं के चुनावों में प्रायः राज्य सरकार के कर्मचारी इस कार्य को निपटा लेते हैं। परन्तु लोकसभा के चुनावों में बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, शिक्षकों, चिकित्सकों व अन्य विभागों के कर्मचारियों को भी इस कार्य में लगाया जाता है।

कुछ लोग, विशेषकर शिक्षक व राज्य सरकार के कर्मचारी तो इस ड्यूटी को खुशी खुशी ग्रहण कर लेते हैं परन्तु एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जिसके हाथपैर चुनावों की घोषणा होने के साथ ही फूल जाते हैं औऱ येन केन प्रकारेण अपनी ड्यूटी कटवाने के लिए जोड़ तोड़ करना शुरू कर देते हैं, अधिकारियों के चक्कर काटते हैं, उनके पास बीमारी या अन्य किसी गम्भीर पारिवारिक झूठे सच्चे बहाने बना कर ले जाते हैं। ऐसा नही है कि सारे ही बहाने हों, निश्चित रूप से कुछ लोगों के लिये, विशेषकर बीमार महिलाओं के लिए ड्यूटी निभाना असम्भव या कठिन हो सकता है, पर अधिकांश झूठे लोगों ने सच्चे लोगों को भी शक की निगाह से देखने पर मजबूर कर दिया है।

चुनावी ड्यूटी एक राष्ट्रीय दायित्व है, इसे निभाना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यह कोई बड़ा भारी काम नही है। पता नही लोग क्यों डरते हैं। एक दिन या ज्यादा से ज्यादा दो दिन यदि थोड़ी सी असुविधा हो भी जाएगी तो राष्ट्रहित में क्या यह सह नही सकते। जो लोग व्हाट्सअप और फेसबुक पर सारी दुनिया को देशभक्ति का पाठ पढ़ाते हैं, देश की रक्षा के लिए पाकिस्तान और चीन से लड़ने के लिए बड़े जोशीले रहते हैं, चुनाव ड्यूटी आते ही राष्ट्र के प्रति उनका जोश तुरन्त गायब हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा किसी हिंसक घटना की आशंका रहती है कुछ संवेदनशील क्षेत्रो में। ऐसी घटना तो कभी भी किसी के साथ हो सकती है। घर बैठे या सड़क पर चलते हुए लोग न जाने कितनी दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं।

हम बीमार होते हुए भी माता वैष्णो देवी के दुर्गम पर्वतों की चढ़ाई कर सकते हैं, केदारनाथ बद्रीनाथ और यहाँ तक कि मानसरोवर की यात्रा बड़े दमखम से करते हैं। लेकिन चुनाव ड्यूटी आते ही पता नही जोश कहां काफूर हो जाता है। यह इतना अच्छा अनुभव है जो जीवन भर याद रहता है। गरीबों, किसानों, महिलाओं, पहली बार वोट डालने वालों की आप सहायता करते हैं तब मतदाताओं को और आपको बहुत अच्छा लगेगा। सुबह सबेरे नहा धो कर तैयार हो कर जब आप मतदान केंद्र में छाती चौड़ी कर के बैठते हैं, अपने हाथ से सारी व्यवस्थाएं करते हैं या करवाते हैं, सब कुछ ठीक है, ई वी एम ठीक है, मतदाताओं की सुविधा की सारी व्यवस्था हो गई हैं यह निश्चिन्त करके कितना संतोष होता है। सुरक्षा बलों के साये में आप रहते हैं। सारे लोग आपके इशारे पर नाचते हैं और भाग भाग कर काम करते हैं। यह बड़ा गजब का अनुभव होता है। राष्ट्रीय पर्व है यह, लोकतांत्रिक त्यौहार है इसे केवल वोट डाल कर ही नही बल्कि वोट डलवा कर भी मनाया जाता है।

मैं आपसे इतनी बातें कह रहा हूँ तो ऐसे ही नही कह रहा। पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाली बात नही है। मैंने बड़ी अच्छी तरह और बड़ी नज़दीक से इस पुनीत कर्तव्य को निभाया है। मेरे अलावा चार भाइयों में से तीन और बैंकिंग सेवा में थे या हैं। लेकिन आज तक कभी ड्यूटी कटवाने के बारे में सोचा भी नही। जब मेरी पोस्टिंग मेरठ हुई तभी चुनाव आ गए। मेरठ बहुत संवेदनशील क्षेत्र है। वहां कर्फ्यू लग गया। मैं ड्यूटी और कर्फ्यू पास लगा कर जा रहा था कि एक पुलिस वाले ने रोक लिया। मैंने पास दिखाया तो वह बडी कड़क भाषा मे बोला, मैनेजर साहब, इस पास को मैं तो पढ़ सकता हूँ, लेकिन बंदूक की गोली पढ़ी लिखी नही होती, जब वो चलेगी तो जिस छाती पर यह पास लटकाए हुए हों ना, इस पास को चीरते हुए छाती में घुस जाएगी। भला इसी में है कि दूसरा रास्ता पकड़ो।

वो शब्द आज तक भूले नही हैं और न वह चुनौती भरी ड्यूटी।

-सर्वज्ञ शेखर
पूर्व बैंकर

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