पढ़ने की आदत डालें

विश्व पुस्तक दिवस पर विशेष पिछली दीवाली की बात है।फेसबुक पर किसी ने एक संदेश पोस्ट किया कि उनके परिवार में किसी का निधन हो जाने के कारण इस बार वह दीपावली नहीं मनाएंगे। उनके कुछ मित्रों ने इसे भी दीपावली का सामान्य संदेश समझा और अपनी ओर से बधाई व शुभकामनाएँ प्रेषित कर दीं। पहले पक्ष ने इस बात का बुरा नहीं माना क्योंकि वह समझ गए कि मूल

साधु-संतों की रक्षा करो सज्जनों को न दो संताप

संतों की निर्मम हत्या सेशोकमग्न है देश हमारा।नर नहीं नरपिशाच हैं वोसाधुओं को जिन्होंने मारा।हत्यारे और संरक्षक उनकेपाएँ सजा कठोर सभी,पुनरावृत्ति होने न पाएऐसी घटना की फिर कभी। अफवाहों को न फैलाओऔर न भरोसा करो उन पर,उत्तेजित, आक्रोशित न होनाइधर-उधर की बातें सुन कर।भीड़ हिंसा अपराध जघन्य हैनिरपराध की हत्या है पाप,साधु-संतों की रक्षा करोसज्जनों को न दो संताप। – सर्वज्ञ शेखर

सप्ताहांत: कोरोना के विरुद्ध युद्ध लड़ रहे ये योद्धा

“जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहींकाम करने की जगह बातें बनाते हैं नहींआज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहींयत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहींबात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिएवे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए ।” सुप्रसिद्ध कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध ने इन पंक्तियों की रचना करीब 75 वर्ष पूर्व की थीं परंतु आज भी कोरोना के

प्रधानमंत्री का नया सूत्र: “वयं राष्ट्रे जागृयाम”…

3 मई तक लौकडाउन बढ़ाने की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यजुर्वेद की एक सूक्ति “वयं राष्ट्रे जागृयाम” को उद्धृत करते हुए कहा “पूरी निष्ठा के साथ 3 मई तक लॉकडाउन के नियमों का पालन करें। जहां हैं वहां रहें, सुरक्षित रहें। “वयं राष्ट्रे जागृयाम” यानी हम सभी राष्ट्र को जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे।” यह पूरी उक्ति है वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:।” यजुर्वेद के नवें अध्याय के

संपूर्ण देश करबद्ध आपका करता है सादर अभिनंदन

लॉकडाउन का करो पालनसतर्क रहो और सावधान,राष्ट्ररक्षकों का भी करना हैहम सब को पूरा सम्मान।हे राष्ट्ररक्षको राष्ट्रवीरो!आपकी कर्तव्यनिष्ठा को नमन,आप सजग हो, आप जागृत होतभी सुरक्षित है जन-जन।कोरोना के विरुद्ध युद्ध मेंसबसे आगे आप खड़े होसंपूर्ण देश करबद्ध आपकाकरता है सादर अभिनंदन।कोरोना का असर है जब तकघूमो न फिरो स्वच्छंद,नमस्ते करो करबद्ध हो करहाथ मिलाना कर दो बंद।मेड इन चाइना बीमारी हैज्यादा नहीं चलेगी,गले मिलना छोड़ दो तोगले नहीं पड़ेगी।सही

सप्ताहांत: रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय

महाभारत का एक प्रसंग अनायास ही स्मृति पटल पर आ गया। महाभारत की प्रचलित कथाओं में से एक के अनुसार युद्ध खत्म होने के बाद श्री कृष्ण जब द्वारिका लौटने लगे तो भारी मन से पांडव अपने परिवार के साथ भगवान कृष्ण को नगर की सीमा तक विदा करने आए। सब की आँखों में आँसू थे। भगवान एक-एक करके अपने सभी स्नेहीजनों से मिल रहे थे। अंत में अपनी बुआ

पंद्रह अप्रैल का सूर्य उगेगा नव उमंग-उत्साह लिए

कोरोना कोरोना कोरोनासारे दिन बस एक ही रोना,छोड़ो भी बस बहुत हो गयाअब कोई और बात करो ना। ताली-थाली-दिया टोटकोंसे भी नहीं बन रहा काम,घर के अंदर बंद रह करभज रहे बस प्रभु का नाम। कर्मशील, कर्मठ भारतवासीनाकारा रह सकते नहीं,पर लौकडाउन के नियमों सेचाह कर भी बच सकते नहीं। पंद्रह अप्रैल का सूर्य उगेगानव उमंग-उत्साह लिए,एक-एक दिन यूँ ही कट रहाजैसे आजादी की चाह लिए। भाग कोरोना भाग जल्दीबहुत

सप्ताहांत: आपत्ति काले मर्यादा नास्ति

कोरोना के विरुद्ध युद्व में 21 दिन के लॉकडाउन का आधा समय बीत चुका है और अब दस दिन शेष रह गए हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर लॉकडाउन का भारत की जनता ने समझदारी से व दृढ़ता से पालन किया। इसी लिए हमारे देश में अन्य देशों की अपेक्षा इस महामारी का प्रसार कम हो पाया। इन पँक्तियों के लिखे जाने तक 2000 लोग भारत मे संक्रमित हैं। इनमें से

अंतर्मन का दीप जलाओ

अंतर्मन के दीप जला करअज्ञानता का तम हरो,कोरोना से बचने को मित्रोनिर्देशों का मान करो।कोविड के जीवाणु काअंत करेगा बस विज्ञान,सामाजिक दूरी रखने परही बस देना अपना ध्यान।दीप जलाओ मानवता काभूखों को कुछ दे दो अन्न,सहायता का दीप जला करमजदूरों को करो प्रसन्न।दीप जलाओ अदब तहजीब काचिकित्सकों का करो सम्मान,दीप जलाओ अनुशासन काकरो न किसी का भी अपमान।दीप जला कर गोदामों मेंरोको कालाबाजारी को,बेईमानी करने से रोकोदीप दिखाओ व्यापारी को।कोरोना

प्रकृति से करो प्रेम प्रिये।

प्रकृति है दाता प्रकृति है भरता, प्रकृति है प्रभु का अनुपम उपहार प्रिये, प्रकृति से करो प्रेम प्रिये। जीवन में आशा प्रेम में भाषा, ऊर्जा, ऊष्मा उत्साह, उमंग प्रकृति ने संचार किए, प्रकृति से करो प्रेम प्रिये। चिड़ियों की चहक पुष्पों की महक, वन-उपवन शीतल मंद पवन, सुरभित पुष्पित गुलज़ार चमन, प्रकृति का है विहार प्रिये, प्रकृति से करो प्रेम प्रिये। प्रकृति की साधना करो आराधना, प्रकृति जब खिलखिलाती चहुँ

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