ताज की धवल छवि

दिवस का अवसान समीप था।गगन था कुछ लोहित हो चला।तरु-शिखा पर थी अब राजती।कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा॥ सुप्रसिद्ध साहित्य मनीषी हरिऔध जी ने यद्यपि यह पँक्तियाँ ताजमहल को लक्ष्य करके नहीं लिखीं थीं परँतु सूर्यास्त का अलौकिक वर्णन जिस प्रकार किया गया है उसके आलोक में ताज की धवल छवि का आजकल जिक्र अवश्य हो रहा है। शाम के साढ़े पाँच बजे जब दिवस का अवसान होता है, आसमान रक्ताभ लालिमा

इन्दिरा कला संगीत विश्‍वविद्यालय – खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)

जब राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) आये ही हैं तो खैरागढ़ जाना कैसे भूल सकते थे। यहाँ विश्व विख्यात इन्दिरा कला संगीत विश्‍वविद्यालय है। इसकी स्‍थापना खैरागढ़ रियासत के 24वें राजा विरेन्‍द्र बहादुर सिंह तथा रानी पद्मावती देवी द्वारा अपनी राजकुमारी ‘इन्दिरा’ के नाम पर उनके जन्‍म दिवस 14 अक्‍टूबर 1956 को की गई थी। यहां ललित कलाओं के अंतर्गत गायन, वादन, नृत्‍य, नाट्य तथा दृश्‍य कलाआें की विधिवत् शिक्षा दी जाती है।